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पेन का लिखा!


पांचवी कक्षा पूरी होने को थी और नई class में जाने की excitement (उत्साह) उसके पूरे शरीर में दौड़ रही थी 10 साल के उसके मन ने खुद के बड़े होने के एहसास को जताते हुए कहा - 'अरे मम्मी ! आपको पता है अगली क्लास से हमें पेन मिल जाएगा फिर मैं भी भैया की तरह पेन से लिखूंगा इसीलिए आज extra maths की worksheet मैं पेन से ही लिखूंगा मेरी थोड़ी practice हो जाएगी।' मैंने काम करते-करते उसे छेड़ते हुए जान बूझकर पूछा - 'आज और कोई subject नहीं पढ़ना maths ही क्यों'! क्योंकि मुझे पता था maths उसका सबसे पसंदीदा विषय है पर जो जवाब उसने दिया मुझे उस जवाब की उम्मीद नहीं थी।

उसने अपने निश्चल शब्दों में कुछ ऐसा कहा जिसने मुझे गहराई से सोचने के लिए मजबूर कर दिया ,उसने बड़े मासूम शब्दों में कहा- ‘अरे मम्मी! maths में गलती होने के chances सबसे कम है ना ! पेन का लिखा मैं मिटा नहीं पाऊंगा… मेरे मन में शब्द उठे- ‘पर तुझे अगले साल सारे विषय पेन से ही लिखने पड़ेंगे फिर कैसे करेगा ??!!’

पर मैंने इन शब्दों को बाहर नहीं आने दिया क्योंकि मैं उसे भविष्य के डर जो अप्रत्यक्ष रूप से उसका मन जानता था इसीलिए उसके मन ने अपना confident subject चुना ,मैं बोलकर प्रत्यक्ष (direct) रूप से उसे ये दिखाना नहीं चाहती थी क्योंकि उसके ‘आज’ में इस डर की कोई जरूरत नहीं थी आज जिस बात की सबसे ज्यादा जरूरत थी मैंने वही किया मैंने बस उसके उत्साह के साथ बहना स्वीकार किया

और उससे कहा- मैं तुझे सबसे अच्छे वाला पेन दिलाऊंगी और वो खुश हो गया ।

बाद में मैंने सोचा इस बात से दो बात निकलती है -


एक तो ये की भविष्य में नए अनुभवों का सामना हम सबको करना ही पड़ता है क्योंकि जिंदगी आगे बढ़ती है नए अनुभव चाहे चैलेंजिंग हो पर उनका सामना सभी को करना पड़ता है चाहे बच्चा हो चाहे हम बड़े और डर अप्रत्यक्ष (indirectly) रूप से हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है डर वही चुनता है जहां उसका आत्मविश्वास और उसकी सुरक्षा जुड़ी रहती है ये human psychology है ।


दूसरी बात वक्त से पहले उन डरों को प्रत्यक्ष रूप से जुबान पर लाकर हम अपने वर्तमान को डर से भर देते हैं । जबकि वर्तमान तो उत्साह, उम्मीद और वास्तविक (real experiences) अनुभवों से जुड़ा हुआ है तो क्यों ना आज में जी कर अपने आज और दूसरों के वर्तमान क्षणों को उत्साह से भर दें !


रुचि हर्ष

Writer & Life Coach

 
 
 

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