अंधेरों से लड़ना पड़ता है
- Ruchi Aggarwal
- Jan 23
- 2 min read

खुद के बुने हुए अंधेरों से लड़ना पड़ता है
उलझना पड़ता है
तब जाकर जिंदगी के आसमां
पर सुबह का सूरज चमकता है
तोहमत और इल्ज़ाम तो दो आसां रास्ते हैं
खुद की कमजोरी से रूबरु होना पड़ता है
तब जाकर जिंदगी के आसमां पर
सुबह का सूरज चमकता है
तकदीर और वक्त की शिकायतें तो
जहां भर में है फैली
फिर भी गिर कर संभालना पड़ता है
तब जाकर जिंदगी के आसमां पर
सुबह का सूरज चमकता है
खुश रहना ही नहीं है जिंदगी का मकसद
गमों को दिल में भर के
रोशन खुद को करना पड़ता है
तब जाकर जिंदगी के आसमां
पर उम्मीद का सूरज चमकता है।
रुचि हर्ष
ये कविता जब मैंने लिखी थी उस समय मैं मेरी लाइफ कोचिंग की पढ़ाई कर रही थी , की कैसे अवचेतन मन हमारी जिंदगी को प्रभावित करताहै जीवन मे आंकलन करने के इंसानी स्वभाव के बारे में जान रही थी। किस तरह, हर अनुभव का दूसरे अनुभव से आंकलन करके हमारा दिमाग सही-गलत, अच्छे-बुरे के प्रभाव में निर्णय लेता है इसी प्रकार हमारा दष्टिकोण बनता है।
और यह भी समझ रही थी कि क्यों (conscious) जागरुकता जरूरी है , वर्तमान के साथ चलना क्यों जरूरी है क्योंकि हमारा दिमाग बुरे अनुभवों की कहानी बना-बनाकर
हमें अंधेरे में रखता है और हमें यह महसूस कराता है कि गलती सिर्फ दूसरों की होती है जिससे इल्जाम मुक्त होकर हम बिना अपराध बोध के जी पाएं पर वास्तविकता ये है ये सबसे सस्ता तरीका है जिंदगी को जीने का, अगर जिंदगी की खूबसूरती देखनी है और सही मायने मे इस जिंदगीको जीना है तो इस अवचेतन मन के बुने हुए अंधेरों से लड़कर हमें बाहर निकालना पड़ता है।
लेखिका और लाइफ कोच
रुचि हर्ष



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