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अंधेरों से लड़ना पड़ता है


खुद के बुने हुए अंधेरों से लड़ना पड़ता है 

उलझना पड़ता है 

तब जाकर जिंदगी के आसमां 

पर सुबह का सूरज चमकता है 


तोहमत और इल्ज़ाम तो दो आसां रास्ते हैं 

खुद की कमजोरी से रूबरु होना पड़ता है 

तब जाकर जिंदगी के आसमां पर 

सुबह का सूरज चमकता है


तकदीर और वक्त की शिकायतें तो 

जहां भर में है फैली 

फिर भी गिर कर संभालना पड़ता है 

तब जाकर जिंदगी के आसमां पर 

सुबह का सूरज चमकता है 


खुश रहना ही नहीं है जिंदगी का मकसद 

गमों को दिल में भर के 

रोशन खुद को करना पड़ता है 

तब जाकर जिंदगी के आसमां 

पर उम्मीद का सूरज चमकता है।


रुचि हर्ष


ये कविता जब मैंने लिखी थी उस समय मैं मेरी लाइफ कोचिंग की पढ़ाई कर रही थी , की कैसे अवचेतन मन हमारी जिंदगी को प्रभावित करताहै जीवन मे आंकलन करने के इंसानी स्वभाव के बारे में जान रही थी। किस तरह, हर अनुभव का दूसरे अनुभव से आंकलन करके हमारा दिमाग सही-गलत, अच्छे-बुरे के प्रभाव में निर्णय लेता है इसी प्रकार हमारा दष्टिकोण बनता है।

और यह भी समझ रही थी कि क्यों (conscious) जागरुकता जरूरी है , वर्तमान के साथ चलना क्यों जरूरी है क्योंकि हमारा दिमाग बुरे अनुभवों की कहानी बना-बनाकर

हमें अंधेरे में रखता है और हमें यह महसूस कराता है कि गलती सिर्फ दूसरों की होती है जिससे इल्जाम मुक्त होकर हम बिना अपराध बोध के जी पाएं पर वास्तविकता ये है ये सबसे सस्ता तरीका है जिंदगी को जीने का, अगर जिंदगी की खूबसूरती देखनी है और सही मायने मे इस जिंदगीको जीना है तो इस अवचेतन मन के बुने हुए अंधेरों से लड़कर हमें बाहर निकालना पड़ता है।


लेखिका और लाइफ कोच

रुचि हर्ष




 
 
 

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