अम्मा-तेरे जाने के बाद
- Ruchi Aggarwal
- Dec 3, 2025
- 4 min read

रिश्तो की परिभाषा से ज्यादा
जिंदगी की परिभाषा को सीखते हुए रिश्ते
मन को पता था वो दिन आएगा, निश्चित था आएगा, बढ़ती उम्र के दरवाजे पर ढलता सूरज, यादो के चंद्रमा को आसमान में छोड़कर अस्त हो जाएगा और वो दिन आ गया।
(27 सितम्बर 2025, शनिवार, 6:48 PM) जिंदगी की एक खूबसूरत लंबी पारी खेल कर अम्मा का हम सब की जिंदगी से अलविदा कहना और फरिश्तों के पंख लगा कर उड़ जाना और मेरे मन का ठहरना, ठहरने से ज्यादा कुछ समय के लिए सुन पड़ जाना।
फिर 12 दिनों तक चलने वाली अंतिम संस्कार से जुड़ी विधियों ने ठहर कर सोचने के लिए इशारा किया मेरे मां ने खुद से ही यह सवाल पूछा- ‘कि अम्मा के मेरे जीवन में होने के मायने क्या थे’ ?? और इस सवाल ने मेरे अंतर मन को जागृति देने वाले जवाब दिए।
मैंने पाया बाबा और अम्मा तो मेरे बचपन के हर हिस्से में है, उन दोनों का होना मतलब जज्बातों का सुरक्षित महसूस करना because they don't judge (आंकलन) me उन दोनो के लाड़ और प्यार ने हमेशा मन को एक एहसास दिया की I am special, और सच कहूं तो ये एहसास जिंदगी में उस खाद का काम करता है जिससे एक पौधा स्वास्थ्य और शक्ति दोनों पाता है।
आज सोचती हूं तो पता चलता है अम्मा ने मेरी जिंदगी को अप्रत्यक्ष रूप से आध्यात्मिक मूल्य और उन पर चलने के लिए रास्ता भी दिया । मैं जब स्कूल में थी तब गुरुजी ( श्री कांति पुरी जी महाराज) से भी उन्ही के माध्यम से मिली और उन्होंने श्रीमद् भागवत गीता की तरफ मेरा रूख मोड़ा और मैंने 12वें अध्याय को पढ़ने से इसकी शुरुआत की ‘भक्ति योग’ और मन की धरातल पर ज्ञान का पौधा उगा ।
मैंने मेरे बचपन से ही अम्मा और बाबा को किताबें पढ़ते हुए देखा है मुझे लगता है किताब पढ़ने की आदत मुझे वहीं से विरासत में मिली है।
जैसा कि हम सब जानते हैं हमारा चुनाव (choices)और हमारे निर्णय(decision) हमारे जीवन को आकार देते हैं और अभ्यास(Practice)उसे दृढ़ता देती है और ऐसा ही मेरे साथ हुआ इसीलिए आज मैं लेखन के क्षेत्र से जुड़ गई हुं। मेरे विचारों ने और एहसासों ने और गहराई में जाकर जब सोचाऔर महसूस किया तो पाया अम्मा का होना मतलब ‘मेरी जिंदगी में एक शान्त, नियमित अभ्यास, (नियम) करने वाली शख्सियत का होना’, उस जमाने में भी आत्मविश्वास,सूझबूझ से अपने निर्णयों को खुद के मूल्यों (values) के साथ तालमेल बनाकर लेना और इस बात को प्रमाणित करता है उनका अकेले ही हरिद्वार जाना (उस जमाने के हिसाब से ये बहुत बड़ी बात है) वहाँ जाकर छात्रों की, गुरुजी की सेवा करना, संयम से भोजन करना , गंगा स्नान करना , सखियों के साथ भजन गाना ,ये सब बातें , यादें मेरे मन में गहरी छाप बना चुके है ।
घर में भी जवान पीढ़ी के साथ बच्चों के साथ उनके ही तरीके की बातें करना, बच्चों के साथ बच्चा बनकर ताश खेलना , लूडो खेलना ना कि अपने जमाने की बातें कर-करके पीढ़ियों का आंकलन (generations judgement) करके यह एहसास दिलाना कि तुम्हारा जमाना गलत है हमने जो जिया बस वही सही था जो कि अक्सर वृद्धावस्था में लोग करते हैं। विचारों का खुलापन यानी आज में होकर जीना live in the present moment.
अम्मा की आज़ादी से पहले की समस्याओं में आरामप्रद जीवन न मिलाना, पति से विचारधार न मिलना ,परिवार में और रिश्तों में सामंजस्य बनाकर पारिवारिक रुतबे को बरकरार रखते हुए जीना ये बात आज की पीढ़ी को सीखने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
उनके 6 बच्चों में से अकस्मात दुर्घटना के कारण 14 साल के सबसे छोटे बच्चे को उन्होंने खोया , मैं स्वयं आज दो बच्चों की मां हूं जब मैं यह सोचती हूं उन्हें कैसा महसूस हुआ होगा इस एहसास को सोच कर भी मैं भीतर तक सहम जाती हूं। इसके बावजूद उनके जीवन में आजकल के दो trend वाले शब्द depression or anxiety मैनें महसूस नहीं की, व्यवहार में बेचैनी काम के चलते बेचैनी, आम जीवन के अंदर होती ही है यह तो जीवन के हिस्से हैं वह हमेशा यही कहती थी । एक स्वस्थ मन और अथाह प्रेम और विश्वास के साथ गुरु भक्ति और ईश्वर भक्ति से जुड़कर वो उन्मुक्त इस दुनिया को अलविदा कहकर चली गई।
पर मेरे मन की धरातल पर वो ऐसी जीवंत छाप छोड़कर गई है जिसको शब्दों में बयां करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है ।
चंद पंक्तियां अम्मा तुझे समर्पित-
तेरे होने मे भी बात थी!
तेरे जाने में भी बात है!
जब तू साथ थी
तेरे प्यार में थी जिंदगी
तू नहीं है
तेरे एहसास में है जिंदगी,
‘उम्र संग जाना है सबको
जीवन है तो मृत्यु भी है’
ये समझदारी की बातें
मन समझता नहीं …
इसलिए ,शायद….
आंखों में है नमी
तेरे जाने से दिल दु:खी है
हां, सचमुच दुःखी है….
पर मुझे मालूम है
तू पहले भी थी
मेरी जिंदगी के आसमान में
तू आज भी मेरे साथ है
तू रोशनी है…
तू ही आशीर्वाद है…
अब एक सवाल और मन पूछ रहा है- कि जब हम इस धरती को अलविदा कहेंगे तब कौन-से जीवन मूल्यों को शिद्दत से जी कर दूसरों के लिए हम क्या उदाहरण छोड़कर जाएंगे ??और इससे भी बड़ी बात अपने आसपास जीवित दुनिया को जिसको हम रिश्तों और दोस्तों का नाम देते हैं उनके भीतर कौन-से एहसास छोड़कर जाएंगे??!!
रुचि हर्ष
(लेखिका और लाइफ कोच)



रुचि जी, आपने अम्मा के जीवन, मूल्यों और उनके प्रभाव को जिस संवेदनशीलता से व्यक्त किया है, वह दिल को छू जाता है। रिश्तों का वास्तविक अर्थ और उनका जीवन पर असर आपके लेखन में खूबसूरती से झलकता है। अम्मा की आत्मा को शांति और आपको शक्ति मिले।